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Seema


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Posted On: 1 Mar, 2016  
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नज्म…!

Posted On: 4 Aug, 2014  
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यही सोच कर |

Posted On: 6 May, 2014  
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क्षमा -प्रार्थी हूँ ॥

Posted On: 10 Jan, 2014  
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बेजान गुड़ियाँ ॥

Posted On: 6 Jan, 2014  
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रिश्तों की जमीन ॥

Posted On: 6 Jan, 2014  
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अधिक से अधिक ?

Posted On: 2 Dec, 2013  
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देवालय के स्वर !!

Posted On: 25 Nov, 2013  
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रिश्ता कोई जरुर !!

Posted On: 12 Nov, 2013  
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बेघर होना !!

Posted On: 12 Nov, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: deepak bisht deepak bisht

सर,यह रचना ,हमारे उत्तराखंड में जान - माल पर आयी प्रकृति की त्रासदी से जुडी है, अफ़सोस हम अपनी स्वार्थ परता की रौ में यह नहीं सोचते की प्रकृति की हवाएं और जमीन की नमी अपने -आप में बहुत संवेदनशील और सहज होती हैं,यहाँ जब से यह क्षेत्र प्रदेश की शक्ल में तब्दील हुआ तब से विकास के नाम पर यदि किसी के साथ नाइंसाफी हुई है वह यहाँ के पर्यावरण की अनदेखी के कारण पूरी की पूरी प्राकृतिक खूबसूरती तहस-नहस हो चुकी है,बहुत दिन नहीं हुए जब यहाँ की राजधानी देहरादून में घरों की बसाहट प्रकृति के अनुरूप ध्यान में लेकर ...;अब यहाँ देखकर ऐसा लगता है कि यह प्रकृति की गोद में बसा शहर,भीतर -भीतर रो रहा है पर ....? मेरे जैसे लोगों के हिसाब से "यदि पर्यावरण की इसी तरह अनदेखी की जाती रही " आगे इस तरह का प्रकृति का प्रकोप नहीं आएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है ,धन्यवाद !

के द्वारा: Seema Seema

के द्वारा: bhagwanbabu bhagwanbabu

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के द्वारा: Shweta Shweta

के द्वारा: drvandnasharma drvandnasharma

के द्वारा: Lahar Lahar

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

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के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

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के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

रविन्द्र कुमार जी ,यूं तो प्रति एक इन्सान सम्वेदनशील होता है पर लेखक वर्ग के ह्रदय में सम्वेदनों के स्वर ईश्वर-कुछ ज्यादा ही डाल देता है-शायद तभी एक लेखक अपने विषयगत - पात्रों के मनोभावों को अपनी रचना शीलता के माध्यम से व्यक्त करने में सफल हो पाता है ,लेखक की भूमिका यहीं समाप्त नहीं हो जाती है बल्कि जब तक उसे पड़ने बाले -महानुभाव लोग ,उस भाव को समझ न ले-तब तक उसका सब परिश्रम निर्थक सा ही जाता है ,पर इस मायने में मेरी किस्मत थोड़ी सी बेहतर है कि आप जैसे लोगों" जो हम लिखते हैं उस पे " की नजर पडती है और प्रति क्रियाएं भी .......! आपने जो भावनाएं व्यक्त की उसके लिए आप का बहुत -बहुत धन्यवाद ...........!

के द्वारा: Seema Seema

के द्वारा: शिवेष सिंह राना शिवेष सिंह राना

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: kavitakidhar kavitakidhar

सीमा जी सादर, आँख …….. पत्थर- की…….. दिल ………… शीशे -का ……. ऐसा -माहौल कहाँ होगा ……..? जहाँ-भी होगा ……… अँधेरा ही -अँधेरा होगा ……..! जो हकीकत आपने देखि उसके बाद के मनोभाव की सही अभिव्यक्ति. आपने जैसी घटना का जिक्र किया है अक्सर ऐसी घटनाएं हो जाती है. कारण सीधा सा है पूरी उम्र काम पर ध्यान रहता है परिवार से नाता लगभग कट सा जाता है और सेवानिवृत्ति के बाद जब हम अपने ही परिवार में जाते हैं तो यकीनन वहां का माहोल आपकी दिनचर्या से बहुत भिन्न होता है वहां आपको ही उसके साथ सामंजस्य करना होता है किन्तु आपकी सोच यदि उसको अपने हिसाब से बनाने की रही तो फिर ऐसी मुश्किलें तो आएँगी ही.जहां सब सक्षम होंगे तो राहे जुदा होना भी लाजमी है.इसलिए सेवा में रहते हुए भी परिवार के साथ मिलनसारिता को जीवित रखें तो यह स्थितियां निर्मित होने की संभावनाएं कदाचित कम होंगी.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: Sumit Sumit

के द्वारा: ajaykr ajaykr

सीमा जी, आपने सुन्दर भावभरी रचना लिखी है. परन्तु यदि उस कथानक पर मुझे लिखना होता तो शायद में कुछ इस तरह से लिखता. आपकी प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा. अन्जान सफ़र का था वो राही कौन सी मंजिल थी उसने चाही ये कौन सुझाये कहां से लाये वो कसक वो बैचेनी वो लाचारी या वो आवारापन जो उसकी आदत से हो बाबस्ता उसे रुकने नहीं देता उसे बैठने नहीं देता उसे कहने नहीं देता क्या है उसके मन की गहराई में किसकी तलाश है उसे अमराई में और फ़िर एक दिन सिर्फ़ एक खबर क्या यही उसकी मंजिल थी क्या यह सफ़र के बाद का सदमा है या फ़िर सफ़र के शुरुआत का गम कौन जाने वो लौटेगा या नहीं और गर लौट भी आया तो वह "वही" होगा या भी नहीं. कौन जाने.......

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

के द्वारा: abhii abhii

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: sonam sonam

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: Jayprakash Mishra Jayprakash Mishra




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